पीड़ित किसानो की बजाय भाजपा और मीडिया की प्राथमिकता Traffic Rules



देर रात मेरे एक cousin ने WhatsApp पर एक फोटो भेजा जिसमे राहुल गाँधी बिना Helmet के मोटरसाइकिल पर Triple Riding कर रहे है जो कि Traffic rules का उलंघन है. हैरानी की बात तो ये है कि मेरा वो छोटा भाई सिर्फ़ 15 साल का है और उसने कभी किसी पार्टी के लिए वोट तक नहीं डाला, सिर्फ़ इतना ही नहीं, उसके खुद के Social Media Profiles में जीप चलाते, बिना हेलमेट के मोटरसाइकिल दौड़ाते और हाथ में बन्दुक लिए तस्वीरें है.

जिसके पास अभी वोट डालने का अधिकार नहीं है, उसके पास License नहीं है, लेकिन भाजपा सरकार और मीडिया के मिले-झूले दुष्प्रचार के चलते वो ना सिर्फ़ गुमराह हुआ, बल्कि अनजाने में उसने राहुल गाँधी जैसे नेता पर उस नियम तोड़ने का इलज़ाम भी लगाया, जिसे वो अपने निजी जीवन में खुद रोज़ाना तोड़ता है.

ये भाजपा की  रणनीति है कि किशोर अवस्था से ही बच्चों को गुमराह कर कांग्रेस पार्टी और उसके तमाम नेताओ के ख़िलाफ़ कर देना, इससे भाजपा का वोट बैंक तैयार हो जाता है. ऐसे लोगो का वोट बैंक, जिन्हे सही गलत के फैसले का तज़ुर्बा लेने से पहले ही सीखा दिया जाता है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता लुटेरे है.


राहुल गाँधी ने Traffic Rules तोड़े ये दिखाया, पर क्यों तोडा ये नहीं! 

मध्य-प्रदेश के मंदसौर में भाजपा सरकार की वादा खिलाफ़ी, किसान विरोधी नीतियों और तानाशाही के शिकार किसान आंदोलन कर रहे थे, जिसमे प्रशासन की चलाई गोलियों से 6 किसानो की मृत्यु हो गयी और बहुत सारे किसान गंभीर रूप से घायल हो गए.

ऐसे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने पीड़ित किसानो से मिलने का फैसला किया, जिसे मीडिया और भाजपा ने नौटंकी का नाम दिया. लेकिन वो ये कैसे भूल गए कि ये वही राहुल गाँधी है जिन्होंने उत्तर प्रदेश में किसान यात्रा निकली थी. तब ना चुनाव थे और ना ही कोई आंदोलन हो रहा था. फिर किसानो से मुलाकात करने जा रहे राहुल गाँधी को राजनैतिक दौरे का नाम देना भाजपा का जनता को गुमराह करने का पैतरा है तो मीडिया की ओछी सोच का प्रतिक भी है.

राहुल गाँधी के इस कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा की गयी थी, तो तमाम मीडिया और कांग्रेस कार्यकर्ता भी उनके साथ मौजूद रहे. मध्य प्रदेश प्रशासन ने सख्त निर्देश दिए थे कि राहुल गाँधी  को किसी भी हालत में सीमा पार ना करने दिया जाये. ऐसे में जब राहुल गाँधी को रोकने की कोशिश की, तो वो नहीं माने. पुलिस ने उनके काफ़िले की सभी गाड़ियों को आगे नहीं जाने दिया, ऐसे में जो युवा कार्यकर्ता मोटरसाइकिल पर थे वे राहुल गाँधी को अपने पीछे बैठा कर सीमा की ओर चल दिए, पीछे-पीछे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट भी एक कार्यकर्ता की मोटरसाइकिल ले कर खुद चल पड़े.

गौरतलब ही कि राहुल गाँधी, सचिन पायलट और तमाम कांग्रेसजन भाजपा सरकार के अत्याचारों से पीड़ित किसानो से सिर्फ़ मुलाकात करने जा रहे थे, लेकिन ये बहुत ही शर्मनाक है कि मीडिया को ट्रैफिक नियम तो दिखाए दिए, लेकिन राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का किसानो के प्रति समर्पण नज़र नहीं आया.

वैसे भारत में तमाम राजनैतिक, सामाजिक दल समय-समय पर मोटरसाइकिल पर शोभा यात्राएं निकालते है, इन शोभा यात्राओं में ना तो कोई हेलमेट पहनता है और ना ही किसी ट्रैफिक नियम का ख्याल रखा जाता है. गाँवों और छोटे कस्बो में बिना हेलमेट और license के वाहन चलाना बहुत ही आम बात है. ऐसे में ये साफ़ हो जाता है कि किसानो की वेदना सुनने जाते हुए राहुल गाँधी को ट्रैफिक के नियम याद दिलाने वाली भाजपा और मीडिया को किसानो से कोई सरोकार नहीं है.


नौटंकी राहुल गाँधी ने की या मध्य-प्रदेश सरकार ने?                        

मीडिया, प्रशासन और भाजपा सरकार तीनो ने एकजुट हो कर पीड़ित किसानो से मिलने की ज़िद्द पर अड़े राहुल गाँधी को नौटंकी का नाम दिया. वैसे बता दे कि राहुल गाँधी पीड़ित किसानो से मिलने आने वाले है, इसकी औपचारिक घोषणा कांग्रेस पार्टी द्वारा की गयी थी और सुचना भी दी गयी थी.

जानकारी मिलने पर प्रशासन ने राहुल गाँधी को सीमा ना पार करने देने के लिए पूरी तैयार पहले से ही कर ली थी, जिसमे  बॉर्डर के गावं नयापुरा में 1 हजार जवान,3 IG, 2 SP और कई SHO को मौके पर तैनात किया और इतना ही नहीं, एक स्थानीय गेस्ट हाउस को अस्थाई जेल में तब्दील किया गया, जहाँ राहुल गाँधी, सचिन पायलट सहित कांग्रेस के तमाम नेताओ को जरुरत पड़ने पर गिरफ़्तार किया जाना था.

गिरफ़्तारी के बाद राहुल गाँधी ने जमानत के लिए साफ़ इंकार कर दिया और वो ज़िद्द पर अड़े रहे कि वो पीड़ित किसानो से मिले बिना कही नहीं जायेगे. 45 degree तापमान में बिना कुछ खाये पिये राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेसजन संघर्ष करते रहे. अंत में प्रशासन को राहुल गाँधी की ज़िद्द के आगे घुटने टेकने पड़े और ये तय किया गया कि उनको किसान परिवारों से राजस्थान-मध्य प्रदेश की सीमा पर मिलवाया जायेगा.

अब गौर करने वाली बात ये है कि जब पहले से ही पता था कि राहुल गाँधी किसानो से मुलाकात करने आ रहे है, प्रशासन ने इतनी तैयारी भी कर रखी थी, तो फिर गिरफ़्तार करने और कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओ के साथ दुर्व्यवहार करने की बजाये पहले से ही किसानो से सीमा पर राहुल गाँधी की मुलाकात का प्रबंद क्यों नहीं किया गया? ये स्पष्ट हो जाता है कि नौटंकी कौन कर रहा था, इतना ही नहीं किसानो पर अत्याचार करने और उनकी हत्या के पश्च्यात अब मुख्य-मंत्री शिवराज सिंह किसानो से वार्ता करना चाहते है और इसके लिए उपवास भी रखेंगे, अब ये हुयी ना कोई असली नौटंकी.


कांग्रेस के कार्यकर्ताओ का सभ्य व्यवहार-पुलिस ने फिर भी किया दुर्व्यवहार

राहुल गाँधी ने सभी कार्यकर्ताओ को पहले से ही निर्देश दे दिए थे कि उनका उद्देश्य कैसे भी करके पीड़ित किसानो से मुलाकात कर ऊनि वर्तमान स्थिति की जानकारी लेना है. इसीलिए उन्होंने सभी कार्यकर्ताओ को सभ्यता और अहिंसा से काम को अंजाम देने का आग्रह किया. 

इसके चलते कांग्रेस पार्टी के तमाम कार्यकर्ता पुलिस कर्मियों का दुर्व्यवहार सहते रहे, इतना ही नहीं प्रशासन के लोगो ने राहुल गाँधी सहित कई नेताओ के साथ दुर्व्यवहार कर माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया, लेकिन किसी की कोई प्रतिक्रिया ना आने और चुप चाप सहते जाने की वजह से चाल कामयाब नहीं हो सकी. गौरतलब है कि अक्सर ऐसे मौको पर माहौल बिगड़ जाता है, कार्यकर्ता और प्रशासन की मुठभेड़ हो जाती है, लेकिन राहुल गाँधी की समझदारी ने ऐसा नहीं होने दिया और ना ही उन्होंने कार्यकर्ताओ को मुद्दे से भटकने नहीं दिया.


मीडिया का सच: ये है असली चेहरा

अगर ध्यान दिया जाये तो Live दिखाई गयी मीडिया रिपोर्ट्स रात के बुलेटिन्स में दिखाई गयी रिपोर्ट्स से काफी अलग थी. काफी समय बाद कांग्रेस को इतना मीडिया कवरेज दिया गया, स्थानीय से ले कर नेशनल चैनल्स और प्रिंट मीडिया मौजूद रहा. लेकिन Live coverage में कोई भी मीडिया कांग्रेस के ख़िलाफ़ कोई भी negative न्यूज़ ढूंढ पाने में नाकाम रहा. 

इसीलिए जो खबरें Live चली वे सभी कांग्रेस के पक्ष में थी, लेकिन रात के बुलेटिन्स में कांग्रेस के ख़िलाफ़ हमेशा की तरह खबरों को जोड़-तोड़ कर पेश किया गया. सभी खबरों में ट्रैफिक नियम वाली ही खबर ज्यादा चली क्योकि इसके आलावा राहुल गाँधी से कही कोई चूंक नहीं हुयी. ऐसे में मीडिया के पास ओर कोई विकल्प  नहीं बचा. 

स्थानीय लोगो की माने, तो मीडिया पहली बार कांग्रेस पार्टी के पक्ष में इसलिए आया क्योकि जिस दिन किसानो पर गोलिया चलाई गयी थी, उस दिन मीडिया-कर्मियों में साथ भी दुर्व्यवहार किया गया था, जिसके चलते मीडिया कांग्रेस पार्टी के पक्ष में ना सही भाजपा के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया था.

वैसे आंदोलन और धरना प्रदर्शन के उग्र होने पर आंसू गैस के गोले, पानी, लाठी चार्ज जैसे हथकंडे तो आम है, लेकिन सीधा गोली मार देने का भाजपा का ये नया अंदाज़ निसंदेह निंदनीय है.मीडिया के कंधो पर समाज को आइना दिखने और हक़ीक़त से रूबरू करवाने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, ऐसे में इस तरह खबरों का रूप बदल कर जनता को गुमराह करना ना सिर्फ़ अनुचित है बल्कि निंदनीय भी है. 

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