राहुल गाँधी की अध्यक्षता में मज़बूत होती कांग्रेस; 2018 में कांग्रेस की लगातार दूसरी बड़ी जीत

जब से राहुल गाँधी ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद की कमान संभाली है, तब से कांग्रेस पार्टी निरंतर मज़बूत होती दिखाई दे रही है. कर्नाटक में जिस तरह से सविधान के ख़िलाफ़ जा कर भाजपा ने मनमाने तरीके से येदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी, उसका कांग्रेस पार्टी ने राहुल गाँधी के नेतृत्व में पुरजोर तरीके से ना सिर्फ़ विरोध किया, बल्कि कानून एवं सविधान के दायरे में रह कर भाजपा को घुटने टेकने पर मज़बूर भी कर दिया. साथ ही साथ पुरे घटनाक्रम ने 'भ्रष्टाचार मुक्त' देश का नारा देने वाली भाजपा सरकार का असली चेहरा जनता के सामने ला दिया, जिसमे राहुल गाँधी की मुख्य भूमिका रही.

गौरतलब है कि जब से राहुल गाँधी कांग्रेस के राष्ट्रिय अध्यक्ष निर्वाचित हुए है, तब से कांग्रेस पार्टी लगातार भाजपा सरकार को पटखनी दे रही है. साल की शुरुआत में राजस्थान में दो लोकसभा सीटों (अलवर व अजमेर) एवं एक विधानसभा सीट (मांडलगढ़) पर उपचुनाव हुए. तीनो सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा था, जो कि दोनों सांसदों एवं विधायका की मृत्यु के चलते खाली हो गयी थी.

ये उपचुनाव कई मायनो में ख़ास था, क्योकि इसी वर्ष के अंत में राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने वाले है और इसीलिए इन सीटों पर हुए उपचुनावों को सेमि-फाइनल के रूप में भी देखा जा रहा था. दोनों पार्टियों ने पुरजोर तरीके से प्रचार-प्रसार किया और भाजपा ने सरकारी संसाधनों सहित प्रशासन का दुरूपयोग भी किया. इतना ही नहीं, उपचुनाव का प्रचार ज़ोर-शोर से चल रहा था, इसी बिच भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झुंझुनू में सभा रख कर चुनावो को प्रभावित करने का प्रयास भी किया.
वहीं दूसरी ओर प्रचार के दौरान अलवर से 'मेरा बूथ, मेरा गौरव' कार्यकर्ता सम्मलेन की शुरुआत करते हुए प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने एलान कर दिया था कि "राहुल गाँधी जी को अध्यक्ष निर्वाचित होने पर ये तीनो सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज़ कर हम उन्हें पहला तोहफ़ा देंगे." मतदान के बाद मीडिया सहित भाजपा ने कांग्रेस को मात्र एक सीट तक समेट दिया था, लेकिन नतीजों में जनता ने पासा पलट दिया. तीनो की तीनो सीटों पर कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज़ कर इतिहास रच दिया. ठीक इसी तरह कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में जीत दर्ज़ की.

ताज़ा मामला कर्नाटक का है जहाँ भाजपा सरकार की तानाशाही ने देश की जनता को चौका दिया था. यहाँ नतीजों में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, लेकिन कांग्रेस ने जनता-दल के साथ गठबंधन कर जादुई आंकड़ा पार कर लिया. इससे पूर्व तीन प्रदेशो में इसी तरह की स्थिति बनी थी, जहाँ कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत हांसिल नहीं कर पायी थी और गोवा, मणिपुर सहित मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी की जगह सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया. इसके विपरीत कर्नाटक में ना सिर्फ़ भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया, बल्कि  येदुरप्पा को राजभवन में मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी और साथ ही साथ बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दिया गया.

जादुई आंकड़े से दूर भाजपा के पास कांग्रेस और जनता-दल के विधायकों को तोड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था. ये बात स्पष्ट थी कि भाजपा ने लोकतंत्र की ना सिर्फ़ हत्या करने का प्रयास किया बल्कि 100 करोड़ में विधयक ख़रीदने जैसी खबरों ने भाजपा के 'भ्रष्टाचार मुक्त' भारत के खोखले दावों की पोल भी खोल दी. इस तानाशाही के ख़िलाफ़ कांग्रेस ने राहुल गाँधी के नेतृत्व में पुरजोर तरीके से विरोध कर दबाव बनाया और सुप्रीम-कोर्ट में शिकायत दर्ज़ कर इसके ख़िलाफ़ सख्त एवं जल्द कार्यवाही की मांग रखी.

आज नतीजा सबके सामने है. सुप्रीम कोर्ट की मदद से राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकतंत्र की ना सिर्फ़ रक्षा की बल्कि भाजपा के दोहरे मापदंडो को भी पुरे देश के सामने उजागर किया. गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षो में कांग्रेस पार्टी ने बहुत सारे चुनाव हारे, लेकिन कभी भी जनादेश का अपमान नहीं किया. जनता ने जो फैसला लिया, कांग्रेस के नेताओ एवं कार्यकर्ताओ ने उसे विनम्रता से स्वीकार किया. इसके विपरीत सत्ता के नशे में चूर भाजपा आज अपनी हार स्वीकार नहीं कर पा रही है.

कर्नाटक के बाद अब जल्द जी राजस्थान, मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले है, जिनकी तैयारियों में भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टिया जुट चुकी है. राहुल गाँधी की मेहनत और गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कर्नाटक चुनाव प्रचार के तुरंत बाद ही वे छत्तीसगढ़ के दौरे पर निकल गए और जल्द ही वे मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी चुनाव प्रचार के सन्दर्भ में दौरे करेंगे. यदि इसी तरह कांग्रेस चुनाव जीतती रही, तो शायद मोदी जी की भी अटल जी की ही तरह एक पारी के बाद ही घरवापसी हो सकती है, अब ये तो समय ही बताएगा कि जनता किसे अपना सिरमौर चुनती है? 

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