देशभर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मूर्तियाँ तोड़े जाने जैसे घटनाक्रम, दलितों पर बढ़ता अत्याचार और आरक्षण पर उठे सवालो ने आजकल भाजपा सरकार को मुसीबत में डाल रखा है. विशेष कर राजस्थान में वसुंधरा सरकार की परेशानियां दलितों की नाराज़गी ने ओर बढ़ा दी है और इस वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावो के चलते ये गंभीर चिंता का विषय बनी हुयी है. इसीके चलते हालही में राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी शहरी निकायों में प्रस्तावित अंबेडकर भवनों में डाॅ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति का प्लेटफार्म विधायक कोटे से बनवाने की घोषणा की है.
दलितों को मनाने के लिए अम्बेडकर की मूर्तियों पर जो राजनीति हो रही है, उसने दिलचस्प मोड़ तब ले लिया, जब भाजपा के ही एक विधायक भवानी सिंह राजावत ने राजपूत समाज को लुभाने के लिए अम्बेडकर के साथ-साथ महाराणा प्रताप की मूर्तियाँ लगवाने के प्रावधान की बात कही. हालांकि विधायक भवानी सिंह का ये दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है, क्योंकि प्रदेश में महाराणा प्रताप स्मारक अभियान के युवा अध्यक्ष चंद्रवीर सिंह राजावत ने भाजपा के विधायक पर दोगली राजनीति जैसे गंभीर आरोप लगाए है.
हमसे खास बातचीत के दौरान चंद्रवीर ने विधायक भवानी सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि "हमारी संस्था पूरे भारतवर्ष में महाराणा प्रताप के 100 स्मारक स्थापित कर रही है । उन स्मारकों के लिए जब हम विधायक महोदय के पास सहयोग मांगने गए, तो उन्होंने साफ़ इंकार करते हुए हमें ही नसीहत दे दी कि महाराणा प्रताप की मूर्तियां लगाना हमारा काम नहीं है, स्मारक लगाना बेकार व फालतू का काम है, इसमें सिर्फ समय और पैसे की बर्बादी है । इसे छोड़कर कुछ ओर काम करें । अब जैसे ही लोग हमारी मुहिम के साथ जुड़ रहे हैं और पूरे राजस्थान में पता लग रहा है तो वह अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए महाराणा प्रताप की मूर्तियां विधायक कोष से लगाने की मांग कर रहे हैं."
विधायक भवानी सिंह के इस रवैये से नाखुश महाराण प्रताप स्मारक अभियान ने अपने सोशल-मीडिया पेज के ज़रिये भी रोष व्यक्त किया. नीचे दिए गए लिंक पर देखे-
https://www.facebook.com/MaharanaPratapSmarakAbhiyan/photos/a.222946265114508.1073741829.218126625596472/264438964298571/?type=3&theater
एक तरफ़ राजपूत समाज की नाराज़गी तो दूसरी ओर दलितों के सरकार पर बढ़ते अविश्वास ने भाजपा की मुश्किलों को बढ़ा दिया है, जिसका नकारात्मक प्रभाव इस वर्ष में अंत मे होने जा रहे विधानसभा चुनावों में अवश्य ही देखने को मिलेगा। लिहाज़ा, अब भाजपा पूरी तरह डैमेज कंट्रोल में जुट चुकी है। जहाँ राजपूत समाज को मनाने के लिए प्रदेशाध्यक्ष पद राजपूत नेता को देने का प्रयास किया गया था, जो कि केंद्र एवं प्रदेश नेतृत्व में आपसी सहमति ना बन पाने के कारण नहीं हो सका, तो वहीं अब विधायक कोष से फण्ड के ज़रिये अम्बेडकर साहब की मूर्ति लगवा कर दलितों को लुभाने का प्रयास भी किया जा रहा है।
राजस्थान में भाजपा की खिसकती ज़मीन
इस वर्ष के अंत मे राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने वाले है, जिसके चलते कांग्रेस-भाजपा सहित अन्य राजनैतिक दल अपने-अपने स्तर पर तैयारियो में जुट चुके है। गौरतलब है कि साल की शुरुआत में हुए अलवर-अजमेर लोकसभा सीट और मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनावों में भाजपा को तगड़ा झटका लगा, क्योंकि इन उपचुनावों को सेमी-फाइनल के रूप में देखा जा रहा था जिसमे जनता का फ़रमान एक तरफ़ा कांग्रेस के पक्ष में रहा।
भाजपा के कार्यकाल का आख़री वर्ष कठिनाईयों भरा रहा। आम जनता के साथ-साथ आंगनवाड़ी कर्मचारी, पेरा-टीचर्स, होमगार्डस सहित डॉक्टरों ने भी हड़ताल कर भाजपा सरकार से पिछले चुनावों में किये वादों का हिसाब माँगा, जिनके जवाब देने में सरकार असमर्थ नज़र आई।
भाजपा के बिगड़ते जातिगत समीकरण
पद्मावती फ़िल्म और आनंदपाल एनकाउंटर जैसे घटनाक्रमो के चलते भाजपा ने राजपूत एवं रावणा राजपूत समाज में अपनी विश्वसनीयता खो दी, जिसका ख़ामियाज़ा भाजपा के प्रत्याशियों को उपचुनाव में भुगतना पड़ा। राजपूत समाज की भाजपा सरकार से नाराज़गी का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के राजपूत प्रत्याशी शक्ति सिंह कांग्रेस के विवेक धाकड़ से हार गए, जिन्हें 2013 में राजपूत समाज की ही कीर्ति कुमारी ने हराया था।
दलितों को कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता आया है, जिसमे पिछले चुनावों में मोदी लहर के चलते भाजपा सेंध लगाने में कामयाब रही। लेकिन भाजपा सरकार के राज में दलितों पर निरंतर बढ़ते अत्याचार, भाजपा सरकार की अनदेखी और आरक्षण के प्रति भाजपा की विचारधारा ने दलितों को भारत बंद जैसा कदम उठाने पर विवश कर दिया। इतिहास में पहली बार दलितों का ऐसा आक्रामक रूप देखने को मिला।
दलितों को मनाने के लिए अम्बेडकर की मूर्तियों पर जो राजनीति हो रही है, उसने दिलचस्प मोड़ तब ले लिया, जब भाजपा के ही एक विधायक भवानी सिंह राजावत ने राजपूत समाज को लुभाने के लिए अम्बेडकर के साथ-साथ महाराणा प्रताप की मूर्तियाँ लगवाने के प्रावधान की बात कही. हालांकि विधायक भवानी सिंह का ये दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है, क्योंकि प्रदेश में महाराणा प्रताप स्मारक अभियान के युवा अध्यक्ष चंद्रवीर सिंह राजावत ने भाजपा के विधायक पर दोगली राजनीति जैसे गंभीर आरोप लगाए है.
हमसे खास बातचीत के दौरान चंद्रवीर ने विधायक भवानी सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि "हमारी संस्था पूरे भारतवर्ष में महाराणा प्रताप के 100 स्मारक स्थापित कर रही है । उन स्मारकों के लिए जब हम विधायक महोदय के पास सहयोग मांगने गए, तो उन्होंने साफ़ इंकार करते हुए हमें ही नसीहत दे दी कि महाराणा प्रताप की मूर्तियां लगाना हमारा काम नहीं है, स्मारक लगाना बेकार व फालतू का काम है, इसमें सिर्फ समय और पैसे की बर्बादी है । इसे छोड़कर कुछ ओर काम करें । अब जैसे ही लोग हमारी मुहिम के साथ जुड़ रहे हैं और पूरे राजस्थान में पता लग रहा है तो वह अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए महाराणा प्रताप की मूर्तियां विधायक कोष से लगाने की मांग कर रहे हैं."
विधायक भवानी सिंह के इस रवैये से नाखुश महाराण प्रताप स्मारक अभियान ने अपने सोशल-मीडिया पेज के ज़रिये भी रोष व्यक्त किया. नीचे दिए गए लिंक पर देखे-
https://www.facebook.com/MaharanaPratapSmarakAbhiyan/photos/a.222946265114508.1073741829.218126625596472/264438964298571/?type=3&theater
एक तरफ़ राजपूत समाज की नाराज़गी तो दूसरी ओर दलितों के सरकार पर बढ़ते अविश्वास ने भाजपा की मुश्किलों को बढ़ा दिया है, जिसका नकारात्मक प्रभाव इस वर्ष में अंत मे होने जा रहे विधानसभा चुनावों में अवश्य ही देखने को मिलेगा। लिहाज़ा, अब भाजपा पूरी तरह डैमेज कंट्रोल में जुट चुकी है। जहाँ राजपूत समाज को मनाने के लिए प्रदेशाध्यक्ष पद राजपूत नेता को देने का प्रयास किया गया था, जो कि केंद्र एवं प्रदेश नेतृत्व में आपसी सहमति ना बन पाने के कारण नहीं हो सका, तो वहीं अब विधायक कोष से फण्ड के ज़रिये अम्बेडकर साहब की मूर्ति लगवा कर दलितों को लुभाने का प्रयास भी किया जा रहा है।
राजस्थान में भाजपा की खिसकती ज़मीन
इस वर्ष के अंत मे राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने वाले है, जिसके चलते कांग्रेस-भाजपा सहित अन्य राजनैतिक दल अपने-अपने स्तर पर तैयारियो में जुट चुके है। गौरतलब है कि साल की शुरुआत में हुए अलवर-अजमेर लोकसभा सीट और मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनावों में भाजपा को तगड़ा झटका लगा, क्योंकि इन उपचुनावों को सेमी-फाइनल के रूप में देखा जा रहा था जिसमे जनता का फ़रमान एक तरफ़ा कांग्रेस के पक्ष में रहा।
भाजपा के कार्यकाल का आख़री वर्ष कठिनाईयों भरा रहा। आम जनता के साथ-साथ आंगनवाड़ी कर्मचारी, पेरा-टीचर्स, होमगार्डस सहित डॉक्टरों ने भी हड़ताल कर भाजपा सरकार से पिछले चुनावों में किये वादों का हिसाब माँगा, जिनके जवाब देने में सरकार असमर्थ नज़र आई।
भाजपा के बिगड़ते जातिगत समीकरण
पद्मावती फ़िल्म और आनंदपाल एनकाउंटर जैसे घटनाक्रमो के चलते भाजपा ने राजपूत एवं रावणा राजपूत समाज में अपनी विश्वसनीयता खो दी, जिसका ख़ामियाज़ा भाजपा के प्रत्याशियों को उपचुनाव में भुगतना पड़ा। राजपूत समाज की भाजपा सरकार से नाराज़गी का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के राजपूत प्रत्याशी शक्ति सिंह कांग्रेस के विवेक धाकड़ से हार गए, जिन्हें 2013 में राजपूत समाज की ही कीर्ति कुमारी ने हराया था।
दलितों को कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता आया है, जिसमे पिछले चुनावों में मोदी लहर के चलते भाजपा सेंध लगाने में कामयाब रही। लेकिन भाजपा सरकार के राज में दलितों पर निरंतर बढ़ते अत्याचार, भाजपा सरकार की अनदेखी और आरक्षण के प्रति भाजपा की विचारधारा ने दलितों को भारत बंद जैसा कदम उठाने पर विवश कर दिया। इतिहास में पहली बार दलितों का ऐसा आक्रामक रूप देखने को मिला।
इतना सब होने के बावजूद भाजपा के नेताओ के समय-समय पर आपत्तिजनक बयान माहौल को ओर बिगाड़ रहे है. विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे है, यदि भाजपा ने जनता को गंभीरता से लेना शुरू नहीं किया तो 180+ का आंकड़ा पार करने का सपना धरा का धरा ही रह जायेगा. दूसरी ओर कांग्रेस जोर-शोर से चुनाव की तैयारियों में जुटी हुयी है, जिसने पहले ही माहौल अपने पक्ष में बना लिया है, अब ये तो वक़्त ही बताएगा कि जनता किसे चुन कर सेवा का अवसर देगी?



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